अमरूद (Guava) भारत का एक बेहद लोकप्रिय और पोषण से भरपूर फल है। इसे “गरीबों का सेब” भी कहा जाता है क्योंकि यह सस्ता होने के साथ-साथ विटामिन C, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होता है। भारत में अमरूद की खेती लाखों किसानों की आजीविका का मुख्य साधन है। अगर आप भी अमरूद की खेती करना चाहते हैं या इसकी बेहतरीन किस्मों के बारे में जानना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए ही है।
अमरूद की खेती किसानों के लिए एक बेहतरीन विकल्प है। एक बार पौधा लग जाने पर यह 30-40 साल तक फल देता है। इसमें लागत कम और मुनाफा अधिक होता है। बाजार में इसकी माँग पूरे साल बनी रहती है। अमरूद की प्रोसेसिंग से जेली, जूस, कैंडी आदि बनाई जाती है, जिससे किसान की आमदनी और बढ़ जाती है।
भारत में अमरूद की कई उन्नत किस्में विकसित की गई हैं। हर किस्म की अपनी खासियत होती है। आइए जानते हैं सबसे लोकप्रिय और अधिक पैदावार देने वाली किस्मों के बारे में:
यह भारत की सबसे प्रसिद्ध और व्यापक रूप से उगाई जाने वाली किस्म है। इसके फल गोल, चिकने और बाहर से हल्के पीले होते हैं। गूदा सफेद और बहुत मीठा होता है। यह किस्म उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश में सबसे ज़्यादा उगाई जाती है। प्रति हेक्टेयर 20-25 टन तक पैदावार मिलती है।
लखनऊ-49 को “सरदार” किस्म भी कहते हैं। इसके फल बड़े, गोल और हल्के हरे-पीले रंग के होते हैं। गूदा क्रीमी-सफेद, कम बीज वाला और अत्यधिक मीठा होता है। यह किस्म ताज़ा खाने के साथ-साथ प्रोसेसिंग के लिए भी उपयुक्त है। उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में यह बहुत लोकप्रिय है।
IIHR बंगलुरू द्वारा विकसित इस किस्म के फल सफेद गूदे वाले, कम बीज वाले और बहुत मीठे होते हैं। यह किस्म दक्षिण भारत के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है। इसमें रोग प्रतिरोधक क्षमता अच्छी होती है।
हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित यह किस्म उत्तर-पश्चिम भारत के लिए उत्कृष्ट है। इसके फल बड़े, गोल और बाहर से पीले होते हैं। गूदा सफेद और मीठा होता है। यह किस्म गर्मी और सूखे को सहन करने में सक्षम है।
ललित किस्म के फल बड़े, गोल और बाहर से आकर्षक नारंगी-पीले रंग के होते हैं। गूदा गुलाबी-नारंगी, बेहद मीठा और सुगंधित होता है। यह किस्म निर्यात के लिए बेहद उपयुक्त है। बाजार में इसकी कीमत भी अच्छी मिलती है।
श्वेता किस्म के फल मध्यम आकार के, सफेद गूदे वाले और कम बीज वाले होते हैं। यह किस्म ताज़ा खाने और प्रोसेसिंग दोनों के लिए अच्छी मानी जाती है। इसमें विटामिन C की मात्रा अधिक होती है।
उत्तर प्रदेश भारत का सबसे बड़ा अमरूद उत्पादक राज्य है। इलाहाबाद (प्रयागराज) का अमरूद पूरे देश में मशहूर है। यहाँ की जलवायु और मिट्टी अमरूद के लिए आदर्श है। बिहार और मध्य प्रदेश में भी बड़े पैमाने पर अमरूद उगाया जाता है। यहाँ रबी सीजन (सर्दी) में अधिक और अच्छी क्वालिटी की फसल मिलती है।
महाराष्ट्र में नासिक, पुणे और सतारा जिलों में अमरूद की खेती बड़े पैमाने पर होती है। यहाँ ड्रिप इरिगेशन की मदद से किसान अच्छी पैदावार ले रहे हैं। गुजरात में भी उन्नत तरीकों से अमरूद उगाया जाता है और यहाँ के किसान निर्यात से अच्छी कमाई करते हैं।
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में अमरूद की व्यावसायिक खेती तेज़ी से बढ़ रही है। यहाँ के किसान हाई-डेंसिटी प्लांटिंग (घनी बुआई) तकनीक अपनाकर प्रति हेक्टेयर अधिक उत्पादन ले रहे हैं। कर्नाटक में IIHR की नई किस्में लोकप्रिय हो रही हैं।
पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद और नदिया जिलों में अमरूद की खेती होती है। पूर्वोत्तर राज्यों में भी स्थानीय किस्मों की खेती की जाती है। यहाँ की आर्द्र जलवायु में अमरूद अच्छी तरह पनपता है।
अमरूद की खेती के लिए दोमट, बलुई दोमट और लाल मिट्टी सबसे उपयुक्त है। मिट्टी का pH 5.5 से 7.5 के बीच होना चाहिए। यह 10°C से 42°C तापमान में उग सकता है। अच्छी जल निकासी ज़रूरी है, क्योंकि जलभराव से पौधे मर सकते हैं।
अमरूद के पौधे लगाने का सबसे अच्छा समय जुलाई-अगस्त (मानसून) और फरवरी-मार्च (वसंत) है। पौधों के बीच 6×6 मीटर या हाई-डेंसिटी के लिए 3×3 मीटर की दूरी रखें।
प्रति पौधा सालाना 50 किलो गोबर की खाद, 300 ग्राम नाइट्रोजन, 200 ग्राम फास्फोरस और 300 ग्राम पोटाश देना चाहिए। सिंचाई के लिए ड्रिप इरिगेशन सबसे कारगर तरीका है। गर्मियों में 7-10 दिन और सर्दियों में 15-20 दिन पर सिंचाई करें।
एक हेक्टेयर में लगभग 250-300 पौधे लगते हैं। 3-4 साल बाद प्रत्येक पौधे से 50-80 किलो फल मिलते हैं। बाजार में अमरूद की कीमत ₹15 से ₹40 प्रति किलो तक होती है। इस हिसाब से एक हेक्टेयर से सालाना ₹2 से ₹5 लाख तक की शुद्ध आमदनी हो सकती है। हाई-डेंसिटी प्लांटिंग से यह कमाई दोगुनी भी की जा सकती है।
कलम (Cutting) या ग्राफ्टिंग से लगाया गया पौधा 2-3 साल में फल देने लगता है, जबकि बीज से लगाया पौधा 3-4 साल लेता है।
लखनऊ-49 और इलाहाबाद सफेदा भारत में सबसे अधिक पैदावार देने वाली किस्में मानी जाती हैं। हाई-डेंसिटी तकनीक से ललित और अर्का मृदुला भी बेहतरीन उत्पादन देती हैं।
हाँ, एक बार पौधा स्थापित हो जाए तो अमरूद कम पानी में भी अच्छी तरह उग सकता है। ड्रिप इरिगेशन से 40-50% पानी की बचत होती है।
अमरूद की खेती भारतीय किसानों के लिए एक लाभकारी, टिकाऊ और कम जोखिम वाला विकल्प है। सही किस्म का चुनाव, उचित देखभाल और आधुनिक तकनीक अपनाकर आप अमरूद की खेती से बहुत अच्छी कमाई कर सकते हैं। चाहे आप उत्तर भारत में हों, दक्षिण में या पश्चिम में – अमरूद की कोई न कोई किस्म आपकी मिट्टी और जलवायु के लिए ज़रूर उपयुक्त होगी।
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